6 Comments

  1. मुस्कान के सूखे सरोवर ,भ्रष्ट हर काठी हुई
    दिन के काले आचरण पर ,रात फरियादी हुई
    रोशनी भी बस्तियों में ,लग रही दागी हुई
    डगमगाती है तुलायें , पंगु नीतियां हुई
    असली पर नकली है भारी ,मात सी छायी हुई ||

    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति
    कविता के सभी तत्व मौजूद है आपकी रचना में
    साथ ही संवेदनशील और १००% सत्य लिखा है आपने
    इसके लिए कहीं ना कहीं सरकार और मन की गन्दगी जिम्मेदार है…

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