सूर्य उदित हुए
सुबह हुई
बड़ी ठंडी सी सुबह थी
सूरज ने भी कोहरे की
चादर ओढ़ रखी थी
वक्त का पता ही ना चला
कब सुबह हुई कब दिन ढ़ला
सुबह, दोपहर सांझ सब
एक सी हो गई
ज़िन्दगी भी यूं ही
कश्मकश में कहीं खो गई
_____✍️गीता
कश्मकश
Comments
8 responses to “कश्मकश”
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अतिसुंदर रचना
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सादर धन्यवाद भाई जी🙏
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सुबह, दोपहर सांझ सब
एक सी हो गई
ज़िन्दगी भी यूं ही
कश्मकश में कहीं खो गई।
बहुत खूब, अति उत्तम पंक्तियाँ, अति उत्तम रचना।-
सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
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वाह शब्दों का चुनाव बहुत बेहतरीन है..
साथ ही शिल्प भी मजबूत है-
सुन्दर समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी
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बहुत ही सुन्दर
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बहुत-बहुत धन्यवाद सुमन जी
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