काँव काँव मत करना कौवे

काँव काँव मत करना कौवे
आँगन के पेड़ों में बैठ
तेरा झूठ समझता हूं मैं
सच में है भीतर तक पैठ।
खाली-मूली मुझे ठगाकर
इंतज़ार करवाता है,
आता कोई नहीं कभी तू
बस आंखें भरवाता है।
जैसे जैसे दुनिया बदली
झूठ लगा बढ़ने-फलने
तू भी उसको अपना कर के
झूठ लगा मुझसे कहने।
रोज सवेरे आस जगाने
काँव-काँव करता है तू
मुझ जैसों को खूब ठगाने
गाँव-गाँव फिरता है तू।
अब आगे से खाली ऐसी
आस जगाना मत मुझ में
तेरी खाली हंसी ठिठोली
चुभती है मेरे मन में।

Comments

11 responses to “काँव काँव मत करना कौवे”

  1. Geeta kumari

    किसी अपने की प्रतीक्षा में लिखी गई कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर कविता और संसार में झूठ बोलने की आदत पर भी विचार व्यक्त करती हुई अति उत्तम रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत खूब, अति सुन्दर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. शानदार लेखन

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  4. अति उत्तम

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

  5. किसीे क आगमन की खबर को बताती हुई कौवे की बोली

    सुंदर लेखन

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