किसान की व्यथा

अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
जन्म ले लिया किसान के
देश कहे अन्नदाता मुझको,
बैठा हूं सड़कों पर शान से।
दिल्ली के बॉर्डर पर पड़ा हूं,
अपने हक की खातिर मैं
खेत छोड़ बॉर्डर पर बैठा,
मैं भी हूं भारत मां का बेटा
धरती पुत्र कह लो,
या फिर कहो किसान रे
अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
जन्म ले लिया किसान के
पूरी सर्दी गुजर गई है,
दिल्ली के ठंडे बॉर्डर पर
थोड़ा सा ध्यान धरो तुम
मेरी भी चंद आहों पर
दुखी हुआ था तब ही आया,
किसको राहों पर रहना भाया
राजनीति ना करो म्हारे संग,
मैं तो एक किसान रे।
अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं,
जन्म ले लिया किसान के।।
_____✍️गीता

Comments

6 responses to “किसान की व्यथा”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏

  2. Satish Pandey

    कवि गीता जी की बहुत सुंदर और सटीक रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत सारा धन्यवाद सतीश जी

  3. Pragya Shukla

    बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद प्रज्ञा

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