भोली जनता को बहुत ठगा ,
सब ठग विद्या बिसरा देंगे।
झूठे वादे भी किए बहुत,
सच का आइना दिखा देंगे।
जनता ही मिलकर न्याय करे,
काले कारनामों की सुनवाई करें।
अपनी करनी जाने वह सब,
तब ही तो मिलकर एक हुए।
दुश्मनी भूल सब हुए खडे ,
बेशर्मी से अब भी है अडे।
भाषा भी उल जलूल हुई ,
घबराहट का यह आलम है।
नेताजी माफ करो,
कचरा सब साफ करो कि जनता आती हैं।
निमिषा सिंघल
कि जनता आती है
Comments
12 responses to “कि जनता आती है”
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आपकी कविता पढ़ कर दिनकर जी की याद आ गयी
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Thanks dear
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वाह बहुत सुंदर रचना
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,😊😊
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Nice
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😍😍
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Wahh
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😀😀
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😀😀
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Nice
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Wah
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😃😃
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