कुछ मिले इस तरह

जैसे धरा कभी गगन से
मिलके भी मिल पायी नहीं
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
जैसे वन में तृष्णा से व्याकुल
ढूँढती, भटकती, फिरती मृग
मेरी भी मृगमरीचिका कुछ इस तरह
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
खुश होते हैं अकसर,
क्षितिज की ओर देख कर
नभ देखो इठला रहा
मदमस्त है भू को चूमकर
यह भ्रम पलता जिस तरह
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
दुख का इम्तिहां देते रह गये
हर दर्द को सहके रह गये
स्वाति के बूँद की
पपीहे को चाहत जिस तरह
हम तुम भी, मिलें कुछ इस तरह ।

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