केवल दो अक्षर का हूँ

अब तक समझ नहीं पाया
खुद को कि
मैं प्यार का कवि हूँ
या नफरत का।
संयोग का कवि हूँ
या वियोग का,
उत्साह का हूँ
या निरुत्साह का।
लेकिन इतना समझ गया हूँ
कि केवल दो अक्षर का हूँ
ढाई अक्षर के प्यार शब्द
से अभी दूर हूँ,
इसलिए
तुम्हें अपना नहीं बना सकता
मजबूर हूँ।
क्योंकि
किसी और की ही आँखों का नूर हूँ,

Comments

14 responses to “केवल दो अक्षर का हूँ”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सुन्दर प्रस्तुति

    1. सादर धन्यवाद सर

  2. Geeta kumari

    सुंदर रचना।कवि की मनः स्थिति का सुंदर चित्रण।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Chandra Pandey

    Very nice

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      Thank you

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