कैसे हैं

उम्मीदों के दरवाज़े पर
आस लगाये
बैठे हैं ।
गुजरोगे
जिन गलियों
से तुम फ़ूल
बिछाए बैठे
हैं।
एक दिन ऐसा भी
आएगा शायद
मेरे जीवन में
तुम हमसे
खुद आकर
पूंछो-और बताओ कैसे हैं ।

Comments

9 responses to “कैसे हैं”

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद

      1. nitu kandera

        Ok

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद जी

  1. Pragya Shukla

    Mast bhai

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