कैसे हो संतोष

मन अस्थिर करता मुझे, कैसे हो संतोष,
खाली खाली आ रहा, खुद ही खुद पर रोष,
खुद ही खुद पर रोष, नहीं संतोष मुझे है,
सौ ठोकर के बाद, नहीं फिर होश मुझे है,
कहे लेखनी मान, बात को यंत्र है तन,
चला रहा है उसे, सौ तरह से मेरा मन।

Comments

10 responses to “कैसे हो संतोष”

  1. बहुत खूब वाह

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    कहे लेखनी मान, बात को यंत्र है तन,
    चला रहा है उसे, सौ तरह से मेरा मन।
    _______ तन को यंत्र और मन को एक सारथी की तरह उस यंत्र को चलाने वाला बताया है कवि सतीश जी ने अपनी इस रचना में,बहुत खूब। छंद युक्त शैली और सुंदर भाव और शिल्प लिए बहुत ही श्रेष्ठ रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. छंद शैली में बहुत सुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

  4. मन अस्थिर करता मुझे, कैसे हो संतोष,
    खाली खाली आ रहा, खुद ही खुद पर रोष,
    खुद ही खुद पर रोष, नहीं संतोष मुझे है,
    सौ ठोकर के बाद, नहीं फिर होश मुझे है,
    कहे लेखनी मान, बात को यंत्र है तन,

    क्या बात है कवि हो तो ऐसा

    1. Satish Pandey

      बहुत खूब

    2. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. क्या बात है सतीश जी बहुत सुंदर रचना

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