कोकिला
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कानों में मिश्री सी घोले,
काली ‘कोकिला’ मीठा बोले।
रूप रंग लुभाते हैं….
पर गुणों के अभाव में
तिरस्कार ही पाते हैं।
गुण अमूल्य समझाती है,
मीठी तान सुनाती है।
पतझड़ हो या रहे बसंत,
सुर में मगन हो जाती है।
दिन देखें न रात कभी,
बड़ी लगन से गाती है।
कुहू कुहू की नकल करो तो फिर से वही दोहराती है।
नीरस पतझड़ के मौसम में,
राग रस ले आती है।
लगता जैसे मधुर कंठ से
जीवन राग सिखाती है।
निमिषा सिंघल
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