स्मृतियां बातें करती हैं

तुम्हारी हँसी तुम्हारा रुदन,
तुम्हारी स्मृतियाँ
संँजो रखी हैं
कीमती दस्तावेजों की तरह कागजों पर मैनें।

तुम्हारी आंँख से टपके आँसू ..मोती बन
स्वर्णाक्षर से लिख गए हैं वहाँ।

कागज के उस जादुई कालीन पर
तुम्हारे साथ
पार हो जाते हैं जंगल-जंगल, नदी, पहाड़।

बारिश में भीगे तेरे- मेरे अल्फ़ाज़ जब बह निकलते हैं….
कलम, कश्ती बन
कर लेती उन्हें सवार।

चलने लगती स्वत: ही उंँगलियों में समा
भरने लगती कागज,
शब्दों का लग जाता अंबार।

जब स्मृतियांँ बातें करतीं
ग्रंथ रच जाते
अनगिनत कविताएंँ हो जाती तैयार।

निमिषा सिंघल

Comments

One response to “स्मृतियां बातें करती हैं”

  1. वाह क्या बात है बहुत सुंदर

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