क्या मैं पागल हूँ

दिल के कब्र में एक मर्तबा झाँक कर तो देख,
मैं उम्मीद की चिराग जलाए बैठा हूँ।
एक न एक दिन मुरादें होंगे पूरे मेरे,
वर्षों से यही उम्मीद लगाए बैठा हूँ।।
तेरी यादों के सहारे ए मेरे हमजोली,
अपनी जीवन की कश्ती सजाए बैठा हूँ ।
हर रात एक एक तारे आसमां से चुरा कर,
तारों से तेरा नाम दिल पे लिख बैठा हूँ।
अपनी तड़पती दास्तां के अनमोल पन्नों पे,
ख्यालों की कलम से अपनी ख्वाईश लिखने बैठा हूँ।
कहे अमित इश्क़ की दीवानगी भी क्या दीवानगी है,
जिसे देखो ज़माने से यही कहता है क्या मैं पागल हूँ।।

Comments

6 responses to “क्या मैं पागल हूँ”

  1. प्रेम के सागर में नहाई हुई सी लग रही है आपकी सुंदर कविता बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद। आपकी समीक्षा मेरे लिए अनमोल रत्न है।

  2. Satish Chandra Pandey

    ख्यालों की कलम से अपनी ख्वाईश लिखने बैठा हूँ ।
    बहुत सुंदर अति उत्तम

    1. Praduman Amit

      समीक्षा के लिए आपको बहुत बहुत शुक्रिया पांडे जी।

    1. Praduman Amit

      आपका मार्ग दर्शन ही मेरे लिए नयी राह है।

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