” क्या; यह सच नहीं ! “

“ यादों की यलगार “

नहीं आती याद तुम्हारी !
गोयाकि ; भूला भी नहीं मैं : तुम्हें !!

मंडराती रहीं कटी पतंग-सी : तुम !
मेरे मन के आँगन मेँ : गुमसुम !!
तुम्हें पाने के लिए भागता रहा : मैं
मर्यादा की मुंडेर तक
गिरने से बे—–ख़बर

एक
एक
कर

चुरातीं रहीं तुम —- मेरे सपने
अपने सपनों मेँ घोलकर
सोतीं रहीं; मीठी नींद : रात—भर

“मैं ; उम्र—भर जागता रहा ………..
तृष्णा लिए भागता रहा …………..”

कहाँ से लाऊं —– तुम्हारे सपने ?
लाया भी; तो —- कैसे बनाऊँ अपने ??

मेरे माथे की; ‘भाग्य—रेखा’ से, मिटाकर नाम
ऊकेर दी गईं; तुम !
किसी अजनबी हथेली पर
: ‘जीवन—रेखा’ की तरह
************—————************

Comments

6 responses to “” क्या; यह सच नहीं ! “”

  1. Shivam Roshan Avatar
    Shivam Roshan

    behtareen ji

    1. Anupam Tripathi Avatar

      धन्यवाद रोशन जी

    2. Anupam Tripathi Avatar

      आभार निरंजन जी

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

Leave a Reply

New Report

Close