मजबूरियां तुम दूसरे की
क्यों समझते हो नहीं,
भाव दिखते वेदना के
क्यों समझते हो नहीं।
गोद में बच्चा पकड़कर
ठुस भरी बस में कोई
माँ खड़ी हो तो उसे
क्यों सीट देते हो नहीं।
यदि कोई बालक किसी का
हो भटकता राह में,
ला उसे सदमार्ग में
क्यों लीक देते हो नहीं।
गर कोई माने न माने
फर्ज अपना मानकर
पथ भटकते को भला
क्यों सीख देते हो नहीं।
जब कोई बच्ची दिखाती
खेल रस्सी में कदम रख
तालियों के साथ
मजबूरी समझते हो नहीं।
मूंगफलियां बेचते जो
दौड़ते हैं गाड़ियों में
उन निरीहों की व्यथा को
क्यों समझते हो नहीं।
क्यों समझते हो नहीं
Comments
6 responses to “क्यों समझते हो नहीं”
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उत्तम रचना
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अतिसुंदर रचना
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“मूंगफलियां बेचते जो
दौड़ते हैं गाड़ियों में
उन निरीहों की व्यथा को
क्यों समझते हो नहीं।”
बड़ी ही मार्मिक अभिव्यक्ति -
जब कोई बच्ची दिखाती
खेल रस्सी में कदम रख
तालियों के साथ
मजबूरी समझते हो नहीं।
_______एक वर्ग की मजबूरियों को दर्शाती हुई और कठिन जीवन के प्रति समाज की चेतना जागृत करवाती हुई कवि सतीश जी की यथार्थ परक रचना और उसकी मार्मिक अभिव्यक्ति। भाव और शिल्प बेहद मजबूत हैं, अति उत्तम प्रस्तुति -

Very nice poem
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अति उम्दा रचना
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