खुद को कमतर आंक मत, खुद पर रख विश्वास,
दूर रह उन चीजों से, जो देती हों त्रास,
जो देती हों त्रास, मार्ग तेरा रोकें जो,
उनसे मत कर नेह, तुझे कमतर मानें जो।
कहे कलम तू प्यार, कर ले पहले खुद से
मुश्किल सारी दूर, रहेंगी खुद ही तुझसे।
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करना हो विश्वास जब, खुद में कर विश्वास।
बिना कर्म के फल खाऊँ, ऐसी मत कर आस।
ऐसी मत कर आस, कर्म ही सर्वोपरि है,
कर्म बिना इंसान, स्वयं का ही तो अरि है।
कहे लेखनी कर्म बिना कुछ नहीं जगत में,
राज कर्म ही चला रहा है सदा जगत में।
——– सतीश चंद्र पाण्डेय।
खुद को कमतर आंक मत(कुंडलिया)
Comments
3 responses to “खुद को कमतर आंक मत(कुंडलिया)”
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अतिसुंदर रचना
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बहुत शानदार रचना है
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“कर्म बिना इंसान, स्वयं का ही तो अरि है। कहे लेखनी कर्म बिना कुछ नहीं जगत में, राज कर्म ही चला रहा है सदा जगत में।”
_____कर्म करने के प्रति सकारात्मक चेतना जागृत करती हुई कवि सतीश जी की बेहतरीन रचना। कुंडलिया छंद कृत बहुत ही सुन्दर और प्रेरक कविता।अति उत्तम प्रस्तुति
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