खुद पर एतवार करते हैं

चलिए एकबार फिर से,
खुद पर एतवार करते हैं ।
बहुत कर लिया गैरो से,
इसबार खुद से ही प्यार करते हैं ।।
बहुत किया भरोसा,
जो भरोसे के हरगिज़ काबिल नहीं थे,
खुद पर भरोसा
चलो अबकी बार करते हैं ।
वक्त के साथ चलने की
हर बार कोशिश की
वक्त को अपने साथ करने की
कोशिश इस बार करते हैं ।
वक़्त कैसा भी हो बीत ही जाता है
बीत गया जो कब लौट के आता है
बीते हुए कल की क्यू अफसोस मनाते हैं
खुद पे भरोसा करके, खुद को आजमाते हैं ।
ये जो आँसू हैं ,आखों में अकसर, कैसे तैर आते हैं
गम के साथी हैं, खुशियों में भी हमेशा साथ निभाते है
इनके ही जैसा बन के चलते हैं ।

Comments

7 responses to “खुद पर एतवार करते हैं”

  1. Satish Pandey

    बीते हुए कल की क्यू अफसोस मनाते हैं
    खुद पे भरोसा करके, खुद को आजमाते हैं”
    खूबसूरत पंक्तियाँ, सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Rishi Kumar

    आपकी सभी कविताओं में से
    यह कविता सबसे अधिक मेरे लिए प्रिय है
    बहुत-बहुत धन्यवाद आपका
    बहुत सराहनीय कविता
    उच्चतम लेखनी
    लेखनी को सलाम

  4. Praduman Amit

    दिलकश अंदाज में सजा हर शब्द अतिसुंदर है।

  5. Suman Kumari

    यहकविता नेप की वजह से दो बार रीपिट हुई है ।
    मैने हटाने कीबहुत कोशिश की पर नहीं डिलिट हुई

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