खुशियों पर सबका ही हक है

खुद ही खाऊं खुद ही पाऊँ
दूजे का हक भी खुद खाऊं
दुनिया का जो भी अच्छा हो
वह मुझे मिले, मैं सुख पाऊँ।
सब पर मेरा राज चले
सब मेरी बातों को मानें
जिसको जैसे चाहे हांकूँ,
इसको दानवता कहते हैं।
मैं भी पाऊँ और भी पायें
खुशियों पर सबका ही हक है,
दुनिया में खुशियां बरसें सब
अपना भाग बराबर खायें।
रहें स्वतंत्र सब जीने को
सबको इज्जत दूँ इज्जत लूँ
इसको मानवता कहते हैं।

Comments

5 responses to “खुशियों पर सबका ही हक है”

  1. वाह सर अतिउत्तम

  2. Geeta kumari

    कवि सतीश जी की लाजवाब रचना । दानवता और मानवता के बीच का फर्क समझती हुई बहुत ही सुंदर कविता ।बेहतरीन कृति ,इस प्रतिभा को प्रणाम

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