गंगापुत्र:-भीष्म पितामह

भीष्म पितामह श्रेष्ठ योद्धा
भारत का मान बढ़ाते हैं
अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते
रण में लड़ने जाते हैं
हस्तिनापुर की सीमाएं सुरक्षित
करने का
प्रण ह्रदय में लेकर वह
प्रिय पाण्डवों के सामने उपस्थित हो
युद्घ को तत्पर हो जाते हैं
दिग्विजयी गंगापुत्र
ना अस्त्र उठायेंगे नारी पर
यह भीष्म प्रतिज्ञा लेते हैं
अपनी मृत्यु को स्वयं बताकर
प्रिय अर्जुन के तीरों से
छलनी हो जाते हैं
धन्य है भारत की धरती
जिसपर ऐसे शूरवीर ने
जन्म लिया
भीष्म पितामह की
निष्ठा से भारत माता का
मान बढ़ा
जय हो भीष्म पितामह की
जय हो
उस परशुराम के शिष्य की
जय हो।

Comments

10 responses to “गंगापुत्र:-भीष्म पितामह”

    1. धन्यवाद

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Nice

    1. धन्यवाद

  2. अति सुन्दर रचना

  3. बहुत सुंदर भाव

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