कूड़े की किसी ढेर में खोया हुआ बचपन ।
भुट्टो को बेचने के लिए दौड़ता बचपन
कोयले की खदानों में डूबता हुआ बचपन
आटे की चक्की ओं में पिसता हुआ बचपन ।
बर्तन कहीं पर मांजता मेला हुआ बचपन। झाड़ू कहीं बुहारता मैला हुआ बचपन।
कालीन कहीं बुनता छी दता हुआ बचपन,
कपड़ों के ढेर में कहीं छिपता हुआ बचपन।
फसलों को काट – काट ढेरी बन चुका बचपन।
स्टेशनों पर चीज भेजता बिकता हुआ बचपन।
चाहा था उसने भी मिले उसको भी एक खुशी पर हाय निगलता गया हर खुशी को बचपन ।
निमिषा सिंघल
गरीबी
Comments
10 responses to “गरीबी”
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Nice
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर रचना
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😀
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Good
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😀
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फिर भी जीवन यात्रा में सबसे हसीं है ये बचपन
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😍
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वाह
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Thanks
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