गरीब की कब्र

गरीब की कब्र पर कहाँ कब दीप जलते हैं ,
रेगिस्तान में आसानी से कहाँ फूल खिलते हैं।

चाँद-तारों की ख्वाहिश तो महल वाले रखते हैं

हम जुगनू हैं अपनी फिजाओं के….हम तो खुद से ही खुद को रोशन रखते हैं।।

Comments

4 responses to “गरीब की कब्र”

  1. बहुत ही उम्दा रचना

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