8 Comments

  1. विकास जी एक साथ इतनी सारी और इतनी बड़ी बड़ी कवितायें डालकर इस मंच को भर देने की बजाय, कुछ अध्ययन में समय लगाओ प्लीज, आप बहुत अशुद्धियाँ लिख रहे हैं, कम लिखिए शुद्ध लिखिए,

  2. विकास सर आपकी कविता तारीफ़ ए काबिल है। मगर यह प्रयास करे कि, आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं ८ या १२ पंक्तियों में ही कहने के प्रयास करे। क्योंकि समय का काफी अभाव है।

  3. विकास जी यहां पर सभी सदस्य पथ-प्रदर्शक एवं ज्ञानी विद्वान हैं सबकी बातों का अनुसरण करना चाहिए आपको भले थोड़ा लिखो मगर प्रभावमयी एवं शुद्ध लिखे
    हमको भी बहुत कुछ सीखना है अभी आप भी सीखें। और गलतियों पर ध्यान दें

    1. जब आप एक भौतिक व्यक्ति की निन्दा करते है तो वह व्यक्ति आत्महत्या करने की प्रयास करता है । लेकिन जो व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर का होता है, उसे मान-हानि का कोई फर्क ही नहीें पड़ता है सर जी ।।
      यह तन है विष की बैलिरी गुरू अमृ़त की खान।
      सीख दियो जो गुरू मिले वो भी सस्ता जान ।।
      संत कबीर ।।

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