गांव छूट गया
मैं शहर में आ गया
याद छूटी ही नही
मन गांव में ही रह गया,
तन शहर में आ गया।
वो खेतों की हरियाली,
चिड़ियों की चहक,
झींगुरों का संगीत,
सावन के गीत।
जाड़ों की कंपकंपी रातों में
वो दादी माँ के किस्से,
मडुवे की रोटी के
छोटे-छोटे हिस्से।
गहत की दाल
गडेरी का साग,
वृत्ताकार बैठकर
तापते आग।
माँ का सा मातृभूमि का आँचल
शुद्ध पानी, शुद्ध हवा,
सामाजिक सद्भाव
परस्पर प्रेम था जीने की दवा।
वो सब छोड़कर
मैं शहर में आ गया
रोजी-रोटी की खातिर
मैं शहर में आ गया,
तन शहर में आ गया
मन गांव में रह गया।
गांव छूट गया
Comments
5 responses to “गांव छूट गया”
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गांव की याद दिलाती सुंदर रचना
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अतिसुंदर भाव
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बेहद खूबसूरत कथ्य और शिल्प के साथ, ग्रामीण जीवन की शुद्धता और निश्छलता बताती हुई कवि की बेहद सुन्दर कविता ।
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गाँव की याद का शाब्दिक चित्रण अनूठा है
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Very nice
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