गीत नया गाता हूँ

तेरी कल्पनाओं का
कायल हुआ जाता हूँ
भावनाओं में तेरी
बहता-सा जाता हूँ
शब्द तुम्हारे फूटते हैं
अंकुरित होकर
तेरी स्मृतियों में खोया सा जाता हूँ
दोपहर में तू घनी छांव सी है प्रज्ञा’
तेरी आँखों में डूबा सा जाता हूँ
गीत तेरे बोलते हैं
जो ना बोल पाती तू
तेरे उन गीतों को मैं
एकाकी में गुनगुनाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
गीत नया गाता हूँ ।।
———-✍✍
प्रज्ञा शुक्ला

Comments

10 responses to “गीत नया गाता हूँ”

  1. बहुत सुंदर। 

    1. Pragya

      Thanks a lot

  2. अतिसुंदर भाव 

    1. Pragya

      धन्यवाद आपका

  3. Amita

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

    1. Pragya

      आभार अमिता जी

  4. Praduman Amit

    दिल छू लेने वाली रचना है।

    1. Pragya

      आपका बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ

  5. Very good creation.

    1. Pragya

      Thanks a lot

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