गुरू की महिमा का मैं,
कैसे करूं बखान ।
गुरू से ही तो किया है,
ये सब अर्जित ज्ञान।
ऐसा कोई कागज़ नहीं,
जिसमे वो शब्द समाएं।
ऐसी कोई स्याही नहीं,
जिससे सारे गुरू – गुण लिखे जाएं
वाणी भी कितना बोलेगी,
कितनी कलम चलाऊं।
दूर – दूर तक सोचूं जितना भी,
गुरू – गुण लिख ना पाऊं।
गुरू के गुण असीमित भंडार,
गुरू ने ही किया बेड़ा पार
मात – पिता इस दुनियां में लाए,
गुरू ने यहां के तौर – तरीक़े सिखाए।
बिना ज्ञान के क्या जीवन कुछ है?
बिना गुरू के हम तुच्छ है।
प्रातः वंदन,मेरे गुरुओं को मेरा अभिनन्दन,
बना दिया जिन्होंने इस जीवन को चंदन।
गुरू की महिमा
Comments
15 responses to “गुरू की महिमा”
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शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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गागर में सागर भरने का
काम किया अनोखा जिसने।
उसकी महिमा कहाँ कहूँ मैं
जीवन दिया चोखा जिसने।।
अतिसुंदर भाव अतिसुंदर रचना ।
शिक्षकदिवस की बधाई मेरी बहना। ।-
🙏 शिक्षक दिवस की बहुत बहुत बधाई भाई जी।
आपकी सुंदर समीक्षा के लिए आपका हार्दिक स्वागत एवम् आभार
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गुरु की महानता को प्रकट करती है सुंदर प्रस्तुति
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका मोहन जी🙏
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बहुत ही प्रखर तरीके से सुन्दर पंक्तियाँ सजी हुई हैं। बिल्कुल सटीक लिखा है कि कोई भी ऐसी स्याही नहीं है, जिससे गुरू के सारे गुणों का वर्णन किया जा सके।
इन पंक्तियों ने भी चार चांद लगाए हैं –
मात – पिता इस दुनियां में लाए,
गुरू ने यहां के तौर – तरीक़े सिखाए।
बिना ज्ञान के क्या जीवन कुछ है?
बिना गुरू के हम तुच्छ है।
आपकी इस विलक्षण काव्य प्रतिभा को पुनः प्रणाम गीता जी।-
उत्साह – वर्धन करती हुई आपकी समीक्षा के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद। मेरी कविता के भाव समझने के लिए आपका हार्दिक स्वागत एवम् अभिनन्दन। मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है इन समीक्षाओं से।
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Wow, very nice
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Thank you very much chandra ji .
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बहुत सुंदर प्रस्तुति
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏
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बहुत खूब
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शुक्रिया सर 🙏
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बहुत खूब
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शुक्रिया पीयूष जी 🙏
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