गैया तुम तो मैया हो

गैया तुम तो मैया हो
है दूध अमृत तुम्हारा
जीने एक सहारा
जिससे पोषित होता है
मन और शरीर हमारा।
हर तरह काम आती हो
जीना हो या मरना हो
हर जगह जरूरत पड़ती
शुभ-अशुभ कर्म करना हो।
दूध, दही, घी, गोबर
गोमूत्र सभी कुछ पावन
जहाँ बंधी रहती हो
पावन होता है आंगन।
कहते ज्ञानीजन यह भी
भवसागर पार लगाती हो
इहलोक में अमृत देती
वह लोक सजाती हो।
गैया तुम तो मैया हो
है दूध अमृत तुम्हारा
जीने एक सहारा
जिससे पोषित होता है
मन और शरीर हमारा।

Comments

8 responses to “गैया तुम तो मैया हो”

  1. वाह, गौमाता पर सुन्दर कविता

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    वाह, कवि सतीश जी ने आज गऊ माता पर बहुत ही सुन्दर पंक्तियां लिखी हैं ।”पावन होता है आंगन।कहते ज्ञानीजन यह भी
    भवसागर पार लगाती हो इहलोक में अमृत देती वह लोक सजाती हो।”
    सत्य ही है गऊ माता का दूध भी अमृत के समान ही है । बहुत सुंदर भाव, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।

    1. इस सुंदर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद। कविता के भाव को इस सटीक तरीके से विश्लेषण करने पर आभार, गीता जी।

  3. गाय में सभी देवताओं का निवास होता है ऐसी है हमारी भारतीय संस्कृति….
    बहुत भावपूर्ण रचना

    1. इस सुंदर टिप्पणी हेतु सादर आभार

  4. अति, अतिसुंदर भाव

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

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