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  1. पता नहीं कहाँ खो गई,
    वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
    फिर से खेलने, फुदकने को,
    आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
    ——— कवि गीता जी की लेखनी की बहुत सुंदर प्रस्तुति। भाव व शिल्प का अद्भुत समन्वय। कविता में सतत प्रवाह है, मौलिकता है, बहुत खूब।

    1. इस शानदार और उत्साह प्रदान करने वाली सुन्दर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी, हार्दिक आभार

  2. पता नहीं कहाँ खो गई,
    वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
    फिर से खेलने, फुदकने को,
    आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
    किस की बुरी नजर है तुम पर,
    यह हमको बतलाओ।
    चीं-चीं चूँ-चूँ करने को,
    फ़िर आँगन में आओ।
    ——-सुंदर भाव तथा शिल्प

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