चाँद सदा ही मुस्काए

दर्पण कब खुद सजता है,
दर्पण के आगे हम सजें।
चाँद रहता है गगन में,
पर मुझे लगे उतरे मेरे आँगन में
हर रात को जब मैं सो जाऊं,
वो रजत छिड़कने आ जाए
तारों की सुन्दर टोली संग,
चाँद सदा ही मुस्काए।।
_____✍️गीता

Comments

15 responses to “चाँद सदा ही मुस्काए”

  1. बहुत ही सुन्दर रचना

    1. हार्दिक आभार चन्द्रा जी

  2. बहुत खूब

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद कमला जी

  3. कवि गीता जी की लेखनी से बहुत सुंदर कविता का सृजन हुआ है। कवि मन के खूबसूरत मनोभाव अंकित हुए हैं। भाव और शिल्प दोनों ही अति उत्तम हैं।

    1. Geeta kumari

      इतनी सुन्दर और उत्साह वर्धक समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी, हार्दिक आभार

  4. बहुत सुंदर

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद सर

  5. वाह अति उत्तम

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सर 🙏

    1. प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद भाई जी

  6. Anu Somayajula

    सही कही गीता जी। दर्पण ने कभी सजने की ज़रूरत ही नहीं समझी।
    सुंदर अभिव्यक्ति

    1. सुंदर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद अनु जी

  7. दर्पण कब खुद सजता है,
    दर्पण के आगे हम सजें।
    चाँद रहता है गगन में,
    पर मुझे लगे उतरे मेरे आँगन में
    हर रात को जब मैं सो जाऊं,
    वो रजत छिड़कने आ जाए
    तारों की सुन्दर टोली संग,

    अति सुंदर रचना

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