चित्र

साँझ हो रही है,
ऊंचे पहाड़ों के शिखर
बादलों से आलिंगन कर रहे हैं।
साफ साफ कुछ नहीं दिख रहा है,
परस्पर प्रेम है
या
बस दिखावा है।
जो भी है
कुछ तो घटित हो रहा है वास्तव में।
अंधेरा होगा तभी सुबह फिर उजाला होगा।
अब
रात भर चोटियों में
फुहारें बरसनी ही हैं।
फुहारें वहाँ बरसेंगी
मन हमारा रोमांचित है।
लेकिन चोटियों पर खड़े वे पेड़
शान्त क्यों हैं,
जिन्हें सबसे पहले बादलों का स्पर्श करना है।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

Comments

15 responses to “चित्र”

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद आदरणीया।

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      हार्दिक धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  1. Kumar Piyush

    Sundar Shabd Chitr

  2. Satish Pandey

    thanks

  3. साफ-साफ में युग्म का प्रयोग हो चाहिए था

    1. Satish Pandey

      होना चाहिए था।

      1. Satish Pandey

        बिल्कुल होना चाहिए था, होना ही चाहिए था, और भी बहुत कुछ हो ना चाहिए था

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