हर बार चिपकाता है
वह पोस्टर।
बैनर टाँगता है हर
चुनाव में।
इस आशा में कि
कभी तो बैठूँगा
अपने विकास की नाव में।
कुछ खिला पिला दिया जाता है
तात्कालिक संतुष्टि को,
ठेके-पल्ले का भरोसा दिया जाता है
ताकि समर्थन की पुष्टि हो,
वह नारे लगाता है जोर से
लेकिन पाँच साल बीत जाते हैं बोर से।
उनकी गाड़ी बदल जाती है,
इसकी उजली दाड़ी निकल आती है,
फिर भी उसका विकास
अटका रह जाता है,
वह भटका रह जाता है।
वह जहाँ था वहीं रह जाता है,
फिर पोस्टर चिपकाने में लग जाता है।
कई पांच साल बीत जाते हैं,
वे जीत जाते हैं
वह हार जाता है,
उसका विकास पड़ा रह जाता है,
और लोग विकसित हो जाते हैं।
चिपकाता है पोस्टर
Comments
4 responses to “चिपकाता है पोस्टर”
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चुनाव की वास्तविकता का चित्रण जहां विकास का नामोंनिशां नही होता, सिर्फ खोखले वादे
बहुत सुंदर लेखन -
वे जीत जाते हैं
वह हार जाता है,
उसका विकास पड़ा रह जाता है,
और लोग विकसित हो जाते हैं।
____________ चुनावों के पहले के खोखले वादे और चुनावों के बाद की वास्तविकता का बहुत ही खूबसूरती से चित्रण किया है कवि सतीश जी ने अपनी इस रचना में। सच्ची अभिव्यक्ति और उम्दा लेखन -

बहुत ही बेहतरीन रचना है सर
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बहुत खूब
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