छिपाना मत

जो भी हो मन में,
देखो कुछ भी छिपाना मत ।
मैं हर भावो को खुद ही समझ जाऊँगा
देखो लोचन पे लाना मत ।
कभी तुमने ही कहा तो था
सच बताने
गर सच बताया तो
दामन छुङाना मत।
कयी गम हैं इन पलकों पर
बताया तो
पलकों को रूलाना मत।
देखो तुम रूठे तो जग रूठा
मैं रूठू , मुझे मनाना मत।

Comments

16 responses to “छिपाना मत”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  1. Rishi Kumar

    बहुत खूबसूरत

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Priya Choudhary

    Wah bhot sunder 👏👏

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  4. वाह बहुत खूब

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

    2. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  5. बहुत ही उम्दा रचना

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद
      समझ में नहीं आ रहा इतनी सारी टिप्पणियों को एक साथ कैसे सहेजू।
      एकबार पुनः आभार ज्ञापित करती हूँ प्रतिमाजी

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