कबूतरों का झुंड एक
उड़ रहा था आकास में।
बीच झाड़ियों के बहुत
दाने पड़े थे पास में।।
युवा कबूतर देख-देख
ललचाया खाने के आश में ।
बोल उठा वो सबके आगे
उतर चलें चुगने को साथ में।।
ना ना करके बूढ़ा बोला
यहाँ न कोई है जनवासा।
जंगल में दाने कहाँ से आए
इसमें लगता है कुछ अंदेशा।।
क्यों दादा तू बक-बक करते
खाने दो हम सबको थोड़ा।
जल्दी -जल्दी चुगकर दाने
आ जाएंगे हम सब छोरा।।
बात न मानी किसी ने उसकी
उतर के आ गए नीचे सब।
मस्ती में हो मस्त एक संग
खाए अंखिया मीचे सब। ।
तभी गिरा एक जाल बड़ा-सा
उन मासूमों के ऊपर।
एक संग में फँस सारे
खींझ रहे थे खुद के ऊपर।।
फर-फर फर-फर करने लगे सब
आकुल-व्याकुल सारे।
दूर खड़ा था एक बहेलिया
लेकर बृझ सहारे।।
आर्तनाद करते बच्चों को
देख पसीजा बूढ़ा।
जोड़ लगाओ उठा चलो
लेकर जाल सब पूरा।।
वही हुआ सब एक साथ में
उड़ने लगे ले जाल को।
दूर कहीं जाके जंगल में
ले धरती आए जाल को।।
मूषक मित्र महान ने क्षण में
कुतर जाल को काटा।
मनमानी और लालच का फल
दुखी करे कह डांटा।।
मान ‘विनयचंद ‘ बड़ों का कहना।
लालच में तू कभी न पड़ना।।
सबसे बड़ा बल होता दुनिया में
एक साथ में रहना,
साथ साथ हीं रहना।
जंगल में दाने
Comments
10 responses to “जंगल में दाने”
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इस तरह की कहानी मैं बचपन में पढा था ।आपकी कविता पढ़ने के बाद बचपन की यादें ताजा हो गई है।
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बचपन की बातें याद रहे
फिर युवा काल सजता है।
धन्यवाद अमितजी
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हमें अपने बड़ों के अनुभव को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
युवा वर्ग को ये सीख देती हुई अति सुंदर रचना ।-
शुक्रिया बहिन
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पुरानी कहानी को बहुत ही सुंदर ढंग से नए कलेवर में प्रस्तुत करते हुए नई पीढ़ी को संदेश देती बहुत ही सुंदर कविता।
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत सुंदर भाव ,अतिसुंदर प्रस्तुति
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धन्यवाद
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सुन्दर
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धन्यवाद
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