
जंजीर है मज़दूर के पास, खोने के लिए

Comments
15 responses to “जंजीर है मज़दूर के पास, खोने के लिए”
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kadve sach ko ugalti he aapki kavita
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धन्यवाद आपका
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nice poem 🙂
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,धन्यवाद जी
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Nice one 🙂
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धन्यवाद
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Aansoo he nehi hai unke paas, Rone ke liye…. Bohut khoob likha hai is dard ke ehsaas ko…bdhaii ho Omparkash jee
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आपका बहुत बहुत धन्यवाद शर्मा जी
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bahut khoob!
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धन्यवाद आपका
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ओमप्रकाश चंदेलजी धन्यवाद ! आप की सेवा में –
दर्द सहकर भी, दुःख बताते नहीं |
आंसू की धार नहीं ,दुखी कहने के लिए ||
भूखे बिता लेते ,खुद बहलाने के लिए |
मजदूर हूँ मजबूर ,दुःख सहने के लिए ||
पांव में छाले पड़े ,कहीं दिखाता नहीं |
थक जाता हूँ , कभी सुस्ताता नहीं ||
धर्म करता हूँ , कभी सताता नहीं |
कर्म पर विश्वास , कहीं घबराता नहीं ||-

बहुत बढ़िया सर
आपका धन्यवाद
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G
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Nice
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वाह
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