मैं हंसी तो हंस दिया,
संग मेरे ये जहां।
वरना ,किसी को, किसी के,
अश्क देखने की फुर्सत कहां।
इसलिए .गम अपने छिपाकर,
मैं भी, हंस लेती हूं यहां।
कलम चलाकर कर लेती हूं,
दिल के जज्बातों को बयां ।
ज़रा ठहर कर, कौन किसकी सुनता है यहां।
ज़रा ठहर कर
Comments
16 responses to “ज़रा ठहर कर”
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वाह वाह
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सादर धन्यवाद 🙏
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यथार्थ काव्य वर्णन
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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खूबसूरत चित्रण
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏🇮🇳
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Atisunder
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बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏🇮🇳
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ब
बहुत ही उम्दा-
Thank you mohan ji🙏
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बहुत सुन्दर
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धन्यवाद जी
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क्या बात है salute
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बहुत बहुत धन्यवाद जी
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अतिसुन्दर
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Thank you very much Piyush ji
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