जीवन का सच्चा आनन्द

पिता-पुत्र सैर को,
निकल पड़े खेतों की ओर
ठंडी-ठंडी पवन चल रही
चलते पानी का था शोर
कोयल कूक रही पेड़ों पर,
और कहीं नाचते मोर
तभी पुत्र ने वहीं पे देखा
एक जोड़ी पुराने जूते,
रखे हैं एक खेत के आगे
पुत्र को थोड़ी मस्ती सूझी
बोला अपने पापा से,
पापा हम ये जूते छिपाएं
फिर कोई उनको ढूंढेगा
तो उसका आनंद उठाएं
पिता हुए थोड़ा सा गंभीर,
दी पुत्र को फिर एक सीख
कभी किसी कमजोर की
कोई वस्तु गायब ना करना
प्रभु सब देखे हैं बेटा,
गरीब की आह से डरना
यदि चाहो आनन्द ही लेना,
तो फ़िर तुम एक काम करो
चंद सिक्के डालो जूतों में,
फ़िर पेड़ों के पीछे आराम करो
मज़दूर काम करके वापिस आया,
जूतों में सिक्कों को पाया
इधर-उधर फ़िर नजर घुमाया,
कोई उसको नज़र ना आया
घुटनों के बल बैठ गया
फ़िर होकर भाव-विभोर
दोनों हाथ जोड़ कर बोला नभ की ओर
हे प्रभु! किसी रूप में आज आप आए यहां
बिन आपकी मर्ज़ी के
ऐसा चमत्कार होता है कहां
हे प्रभु तेरा ऊंचा नाम
बीमार पत्नी की दवाई का,
भूखे बच्चों की रोटी का
कर गए हो इंतजाम
पिता-पुत्र पेड़ों के पीछे से,
देख रहे थे ये नजारा
पिता ने कहा,
क्या इससे अधिक आनन्द
मिल पाएगा बेटा दोबारा
कष्ट किसी के कम करके,
काम यदि तुम आ जाओ
फ़िर इस जीवन के सच्चे
आनन्द को तुम पा जाओ
_____✍️गीता

Comments

6 responses to “जीवन का सच्चा आनन्द”

  1. विचारणीय कथ्य तथा सोंचने पर मजबूर करती उम्दा रचना

    1. समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

  2. बहुत सुन्दर चित्रण

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद संदीप जी

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत शुक्रिया भाई जी🙏

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