जूनून – काश सपने मैं जी लू

बेवजह ख्वाब को हम जिए जा रहे हैं

हकीकत को धोखा दिए जा रहे हैं

पता है मयस्सर, न होंगी ये ख्वाहिश

मगर कोशिशें हम, किए जा रहे हैं

मिली मुफ्त में है, ये नींदे ये ख्वाहिश

अगर टूटी ख्वाहिश, बेशक न रोना है

खुलेगी जब आंखें, जनाब

सामना हकीकत से ही होना है

✍️स्वरचित कविता-प्रिया वर्मा

Comments

10 responses to “जूनून – काश सपने मैं जी लू”

  1. Priya Verma

    स्नेही मित्रगणो से विनम्र निवेदन है की वे कृपया मेरी स्वरचित कविता देखे और मेरी प्रेरणा बनकर मेरा मार्गदर्शन करें

  2. Priya Choudhary

    बहुत खूबसूरत पंक्तियां👏👏

    1. Priya Verma

      सादर आभार आदरणीया 🙏🙏

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    आखिर के शैर को शुरूआत में रखते और शुरुआत वाली
    पदों को climex में तो अच्छा होता।
    फिर भी बहुत अच्छी रचना।

  4. Priya Verma

    आप सभी स्नेही मित्रगण को सादर प्रणाम और हार्दिक आभार की आपने मेरी रचना केवल देखा ही नहीं बल्कि मार्गदर्शन भी किया, आशा है आगामी दिनों मे आपका स्नेह बढ़ता रहेगा 🙏🙏

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