ब्रह्मचर्य, हाँ ठीक है कहना,
लेकिन क्या भारतमाता के
सभी पुत्र ब्रह्मचारी बन
सृजन से दूर चले जाएँ।
नहीं – नहीं नयी पीढ़ी का
सृजन युवा रक्त से हो,
इसलिए विरक्ति की नहीं जरुरत
सृजन की ओर अनुरक्त रहो.
हाँ सृजन की राह धर्म पर हो
सद्सृजन हो, कुकर्म न हो।
दैवी प्रकृति है वरदानी
जो भी सृजन हो धर्म से हो।
जो भी सृजन हो धर्म से हो
Comments
9 responses to “जो भी सृजन हो धर्म से हो”
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वाह बहुत सही लिखा है
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सादर धन्यवाद, स्वागत
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Thak you ji
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बहुत खूब
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धन्यवाद शास्त्री जी
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nice
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thanks
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