झरना

पर्वतों की गोद से निकल,
झरने का जल बह चला।
मिलन करूं मैं धरा से,
यह कह कर चला।
मिलन हुआ धरा से,
पर उस मिलन में,
घना ताप सहकर
जल बना वाष्प,बने मेघ
और बरखा बन बरस गया।
जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने,
जहां जन जीवन जल को तरस गया।
सफ़ल हो गया जीवन झरने का,
झर-झर झरते कुछ कर गया।।
_____✍️गीता

Comments

5 responses to “झरना”

  1. बहुत सुन्दर रचना, लाजवाब अभिव्यक्ति

    1. Geeta kumari

      समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

    1. सादर आभार भाई जी 🙏

  2. पर्वतों की गोद से निकल,
    झरने का जल बह चला।
    कहीं किसी की प्यास बुझी,
    कहीं किसी का पाप धुला।।
    वाह 👌 बहुत सुंदर 🙏

Leave a Reply

New Report

Close