हम भी एक महल बनाए है
उलफत के सरज़मीं पे
महफूज रहे मेरा महल
इसीलिए वफा की चादर
ओढा़या है हमने महल पे ।
देखें ज़ुल्म में कितनी ताक़त है
जो महल को हीला दे
चाहत की जंजीर से
इसे बांधा है हमने ।
आजमाइश होगी एक न एक दिन
किसकी होगी जीत
यह फैसला हो जाएगा
इन्तजार है हमें उस घड़ी की
जिस दिन कयामत
मेरे कायनात से टकराएगी।
टक्कर

Comments
7 responses to “टक्कर”
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अति सुंदर भाव, सुन्दर रचना
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धन्यवाद महोदय।
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बहुत खूब
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शुक्रिया।
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सुन्दर रचना
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धन्यवाद।
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बहुत खूब
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