डर का वजूद कुछ नहीं
ये स्वयं जनित मनोभाव है
आसन्न खतरे की चिंता से
उत्पन्न भय निराशावाद है
एक अंतहीन भ्रम की स्थिति
हक़ीक़त के धरातल पर
भय का ना कोई ओर छोर है
किसी कार्य के क्रियान्वन से पहले
उद्विग्न मन में उठा ये शोर है
अरे! मुझे डर लग रहा है
डर का दबदबा कायम है
हमारे मन मस्तिष्क में,
बड़े शातिर अंदाज़ हैं इस डर के
हावी रहता है कल्पनाओं पर
मिल जाता है जाकर अतीत में
रोकने को तैयार जैसे जीत के मंज़र
काबू करना चाहता हो कहीं अंतर्मन को
सोचो खुद को बंधन में क्यों रखना
क्यों ना डर पर ही घात किया जाए
क्यों न इस डर को ही डराया जाए
इसके झूठे इरादों से पीछा छुड़ाया जाए
असफ़लताएँ कुछ मिली भी तो क्या
आने वाले भविष्य को क्यों न संवारा जाए
ये निगोड़ा डर भी कहीं भाग जाएगा
जब इच्छाशक्ति से प्रबल मन जाग जायेगा
डर
Comments
9 responses to “डर”
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कविता अच्छी है।
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Shukriya 🙏🏼
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Nice
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Thank you
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भाव अच्छे हैं
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Thank you🙏🏼
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वेलकम
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अखियां रचना उच्च कोटि की है
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बहुत खूब, वाह वाह
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