तप रही है धरा,
तप रहा गगन है l
तपा-तपा सा,
मेरा भी मन है l
बीतता ही नहीं है,
आया यह कैसा मौसम है l
प्रभात का कंचन भानु भी,
दे रहा है तपन l
एक पवन के शीतल झोंके को,
तरस गया है मेरा मन॥
_____✍गीता
तप रही है धरा

Comments
10 responses to “तप रही है धरा”
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बहुत भावुक रचना, उच्चस्तरीय प्रस्तुति
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समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी
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Bahut sundar rachna
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आभार चन्द्रा जी
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सुंदर चित्रण।
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आभार सर
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बहुत ही सुंदर प्रस्तुति दीदी जी
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धन्यवाद एकता
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बेहतरीन सृजन गीता दी 🙏🙏
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धन्यवाद अमिता जी
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