संग संग

जी चाहता है चाँद के संग संग मैं भी
चलूं। मगर सितारे कहते है क्या मैं उदास हो जाउँ।। सदियों से मैं संग संग रहा , वो दीया मैं बाती रहा ।
जब वो चमकता था तब मैं उसका इर्दगिर्द पहरेदार बना रहा ।।
अब तुम ही बताओ मैं कहाँ जाउं
इस बेरहम ज़माने में।

Comments

5 responses to “संग संग”

  1. लाजवाब, बहुत खूब

    1. Praduman Amit

      आभार।

  2. अति सुन्दर रचना

    1. Praduman Amit

      धन्यवाद

  3. बहुत सुन्दर 

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