जी चाहता है चाँद के संग संग मैं भी
चलूं। मगर सितारे कहते है क्या मैं उदास हो जाउँ।। सदियों से मैं संग संग रहा , वो दीया मैं बाती रहा ।
जब वो चमकता था तब मैं उसका इर्दगिर्द पहरेदार बना रहा ।।
अब तुम ही बताओ मैं कहाँ जाउं
इस बेरहम ज़माने में।
संग संग

Comments
5 responses to “संग संग”
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लाजवाब, बहुत खूब
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आभार।
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अति सुन्दर रचना
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धन्यवाद
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बहुत सुन्दर
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