दिल का भवन तो आपका
बेहद सजीला है,
फटे से पांव रखने में
मुझे लज्जा सी आती है।
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आप हो सामने तो
मुस्कुराहट छुप सी जाती है
मगर भीतर ही भीतर से
तराना गुनगुनाती है।
तराना गुनगुनाती है
Comments
5 responses to “तराना गुनगुनाती है”
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वाह क्या बात है सर, बेहतरीन काव्य रचना हो रही है।
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वाह वाह बहुत खूब
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वाह वाह बहुत ही सुंदर भाव पूर्ण रचना
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लाजवाब✍
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कवि सतीश जी की अति भाव पूर्ण रचना है ।बे हिसाब गहराई लिए हुए अति शालीन प्रस्तुति । लेखनी से शानदार साहित्य प्रस्फुटित हुआ है ।
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