तराना गुनगुनाती है

दिल का भवन तो आपका
बेहद सजीला है,
फटे से पांव रखने में
मुझे लज्जा सी आती है।
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आप हो सामने तो
मुस्कुराहट छुप सी जाती है
मगर भीतर ही भीतर से
तराना गुनगुनाती है।

Comments

5 responses to “तराना गुनगुनाती है”

  1. वाह क्या बात है सर, बेहतरीन काव्य रचना हो रही है।

  2. वाह वाह बहुत खूब

  3. वाह वाह बहुत ही सुंदर भाव पूर्ण रचना

  4. Geeta kumari

    कवि सतीश जी की अति भाव पूर्ण रचना है ।बे हिसाब गहराई लिए हुए अति शालीन प्रस्तुति । लेखनी से शानदार साहित्य प्रस्फुटित हुआ है ।

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