तिलक

विजय श्री का तिलक
तभी तो लगेगा
जब बन के चट्टान
अग्नि पथ पर चलेगा
कमजोर खुद को समझना है भूल
कीचड़ में भी तो खिलता है फूल
प्रश्न चिन्ह की मुद्रा से
तुम ना निहारो जीत का बिगुल
बजा के ना हारो
सरहद पर जब भी
कोई लड़कर मरेगा
विजय श्री का तिलक
तभी तो लगेगा
एहसास जीत का होता वही
जो गिर गिर संभल के चलते रहे हैं
हारे तो वह जो निकले नहीं
पथरीले पथ से डरते रहे हैं
रोशन उसी का नाम हुआ
जो अपनी ही धुन में बढ़ता गया
टूटा गिरा फिर भी जिंदा रहा
लक्ष्य का प्रतिबिंब मन में गढ़ता गया
घर घर में होगा खुशियों का वास
मन का रावण खुद से डरेगा
विजय श्री का तिलक
तभी तो लगेगा
जब बनके चट्टान
अग्निपथ पर चलेगा
अग्नि पथ पर चलेगा
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

6 responses to “तिलक”

  1. प्रेरक रचना

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