तुम्हारे अंजुमन में

तुम्हारे अंजुमन में जब कभी
दो शब्द बोलूंगा,
हिला दूँगा मैं भीतर तक
सामने सत्य ला दूँगा।
नहीं चिंता मुझे है अब
कि मैं बदनाम होऊँगा
कर दिया खत्म सब तुमने
कहाँ अब नाम पाऊँगा।

Comments

14 responses to “तुम्हारे अंजुमन में”

  1. बहुत शानदार

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    क्रोधित व्यक्ति की भावनाओं की सटीक प्रस्तुति…

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. सादर धन्यवाद शास्त्री जी

  3. Praduman Amit

    बहुत सुंदर चित्रण है। आनंद आ गया।

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

  4. बहुत ही अच्छी कविता ।बहुत ही सधे शब्दों का चयन
    मन के उद्दगार का सटीक चित्रण

    1. इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु बहुये बहुत धन्यवाद, 🙏🙏

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