‘ये मेरी मोहब्बत की, शिद्दत का सिलसिला था,
दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..
ज़िद थी गज़ब की मुझमे, तुझको जीताने की,
हर बार हारकर भी, जीता जो हौसला था..
मुझमे रवाँ तू जितनी, पर उतना मैं नही हूँ,
बरसों की शिकायत थी, मुद्दत से ये गिला था..’
दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..
– प्रयाग
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