दर्द भरी इक गुज़ारिश

मेरे घर में रहे तो फिर किराया दे गए होते
भंवर में था , मुझे कोई किनारा दे गए होते
नहीं कुछ और ख्वाहिश है सनम तुमसे मुझे लेकिन
चले जाना हि था तो दिल हमारा दे गए होते।
शक्ति त्रिपाठी देव

Comments

6 responses to “दर्द भरी इक गुज़ारिश”

  1. Geeta kumari

    सुंदर पंक्तियां

  2. Shakti Kumar Tripathi

    TQ sister

    1. Shakti Kumar Tripathi

      Tq so much sir🙏

  3. व्यंग करती हुई सुंदर रचना

  4. Satish Pandey

    वाह वाह

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