दादी माँ

आज दादी की बहुत याद आई!
वो बेचैन आत्मा ना जाने कहाँ
घूमती होगी….
ब्रह्मांड के किन कोनों से
गुजरती होगी…
कोई नहीं जानता…
जब मैं भूखी होती थी
तो दादी मां अपने हाथों से
खाना बनाती थी…
और पूरे परिवार को
हंसी-खुशी खिलाती थी…
वह दादी मां
आज बहुत याद आ रही है…
न जाने कहां ब्रह्मांड के किन
कोनों से टकराकर…
गुजरती होगी उसकी आत्मा
न जाने कहां होगी मेरी दादी मां..
शायद मुझे देख रही होगी..
और मुझे सुन रही होगी..

Comments

7 responses to “दादी माँ”

  1. मार्मिक रचना

  2. बहुत मार्मिक

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