क्या माँ ने कभी विशेष दिन ही ममता लुटाया है।
क्या माँ ने मात्र किसी खास दिन ही खिलाया है।
क्या पिता ने कोई दिन देखकर जरूरतें पूरी की,
या फिर केवल एक दिन सही गलत सिखाया है।
इन्हें किसी एक दिन पूजना हमारी संस्कृति नहीं,
फिर मात्र एक दिन ही विशेष किसने बनाया है।
कैसी विडंबना है, हम कहने को तो आजाद हैं,
परंतु पाश्चात्य सभ्यता ने हमें गुलाम बनाया है।
देवेश साखरे ‘देव’
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