दीप्त जग हो गया सब

सुबह-सुबह की लालिमा
बिखरी हुई है सब तरफ
ओस की बूंद मोती सी
बिखरी हुई है सब तरफ।
भानु का नूर है आलोक
चारों ओर फैला,
धरा-आकाश मानो बन गए
मजनूँ व लैला।
स्वच्छ पावन मिलन
रात- दिन का हुआ जब
सृष्टि होकर सुबह की
दीप्त जग हो गया सब।
कांतिमय हो दिशाएं
खींचती ध्यान सबका,
मनोरम खेल है यह
सुहाना चक्र रब का।

Comments

8 responses to “दीप्त जग हो गया सब”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    प्रात: काल की बेला का बहुत ही सुन्दर और मनोहारी दृश्य का चित्रण प्रस्तुत किया है कवि सतीश जी ने ।”सुबह-सुबह की लालिमा बिखरी हुई है सब तरफ ओस की बूंद मोती सी” ऊषा काल पर बहुत
    सुन्दर कविता

    1. Satish Pandey

      इस सुन्दर समीक्षागत टिप्पणी हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद। अभिवादन

  3. अति सुंदर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. सुबह का मनोरम चित्रण

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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