दीप आश की

कुछ खो सा गया था
इक दूरी जब बन सी गयी थी
पुनः खुद को समेटा
टूटकर बिखर सी गयी थी।
फिर से आपने
जो हौसला बढाया
निखरने की कोशिश में
क़दम मैने बढाया
यह कोशिश कामयाब होगी
उत्साहीन सी हो मैं गयीं थीं ।
एक मंच यह ऐसा मिला है
जहाँ अनजानों से हौसला बढ़ा है
फिर से अनजान रिश्ता बना है
ना शिकवा यहाँ न कोई गिला है
यह सफ़र हमारा ऐसे ही का चलता रहे
आप के सानिध्य में फूलता- फलता रहे
दीप आश की, दिख रही, जो बुझ सी गयी थी।

Comments

12 responses to “दीप आश की”

  1. बहुत ही सुंदर भाव लिए हुए सुंदर शिल्प से सजी बेहतरीन रचना

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर भाव और सुन्दर रचना है सुमन जी ।बिल्कुल ये मंच एक परिवार जैसा ही है। जहां अनजाने भी पहचाने से हो जाते हैं।

  3. मैं जानती हूं सुमन जी
    हर कवि के जीवन में एक खालीपन होता है
    उस खालीपन में अनगिनत दर्द होते हैं जो कवि को संवेदनशील बनाते हैं
    लेकिन यह संवेदनशीलता एक आम इंसान को कमजोर बना सकती है पर कवि के लिए यह वरदान सिद्ध होती हैं हम अनजान नहीं अपने ही हैं आपको आपकी कविताओं से जान वा समझ चुके हैं..

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

      1. Suman Kumari

        मेरे पास शब्द नहीं ।
        पर यह मंच, आप सबो का साथ, अच्छे कर्मों की निशानी है ।

  4. अत्यंत सुंदर रचना

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद ऋषिजी

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद विनयजी

  5. Sandeep Kala

    अत्यन्त सुन्दर भाव

    1. Suman Kumari

      सादर आभार संदीप जी

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